Vardaan Watermark
Vardaan Learning Institute
ICSE Class 10 Hindi (Sahitya Sagar) • Chapter Notes
🌐 vardaanlearning.com 📞 9508841336

मेघ आए (Megh Aaye)

megh aaye monsoon
पाठ परिचय

कवि: सर्वेश्वर दयाल सक्सेना
कविता का स्वर: प्रकृति का मानवीकरण और ग्रामीण परिवेश
सारांश: 'मेघ आए' कविता में कवि ने वर्षा ऋतु के आने का अत्यंत सजीव और सुंदर चित्रण किया है। कवि ने मानवीकरण अलंकार का प्रयोग करते हुए बादलों (मेघों) को शहर से गाँव आए हुए किसी सजे-धजे दामाद (पाहुन) के रूप में दर्शाया है। जिस प्रकार दामाद के गाँव में आने पर पूरे गाँव में उत्साह, उमंग और हलचल मच जाती है, ठीक उसी प्रकार गर्मी के बाद जब काले बादल सज-धज कर आसमान में घिरते हैं, तो पूरी प्रकृति—हवा, पेड़, धूल, लताएँ, नदियाँ और तालाब—खुशी से झूम उठते हैं और उनका स्वागत करते हैं।

पद्यांशों की सप्रसंग व्याख्या

पद्यांश 1: मेघ रूपी मेहमान का आना

मेघ आए बड़े बन-ठन के, सँवर के।
आगे-आगे नाचती-गाती बयार चली,
दरवाज़े-खिड़कियाँ खुलने लगीं गली-गली,
पाहुन ज्यों आए हों गाँव में शहर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के, सँवर के।

शब्दार्थ: मेघ = बादल; बन-ठन के = सज-धज कर; बयार = हवा; पाहुन = मेहमान/दामाद।

प्रसंग: इस पद्यांश में कवि आसमान में काले बादलों के छाने और तेज़ हवा चलने का सुंदर मानवीकरण कर रहे हैं।

भावार्थ: कवि कहते हैं कि आसमान में काले-काले बादल इस तरह घिर आए हैं, मानो कोई शहरी मेहमान (दामाद) सज-धज कर (बन-ठन कर) गाँव में आया हो। बादलों के आने की सूचना देने के लिए उनके आगे-आगे ठंडी हवा (बयार) मानो नाचती और गाती हुई चल रही है। बादलों (रूपी मेहमान) को देखने के उत्साह में गाँव की हर गली में लोगों ने अपने-अपने घरों के दरवाज़े और खिड़कियाँ खोल दी हैं, बिल्कुल वैसे ही जैसे गाँव के लोग शहर से आए दामाद को देखने के लिए उत्सुक होकर खिड़कियों से झाँकने लगते हैं। आज मेघ बड़े ही सज-धज कर आए हैं।

पद्यांश 2: प्रकृति द्वारा मेघों का स्वागत

पेड़ झुक झाँकने लगे गरदन उचकाए,
आँधी चली, धूल भागी घाघरा उठाए,
बाँकी चितवन उठा, नदी ठिठकी, घूँघट सरके।
मेघ आए बड़े बन-ठन के, सँवर के।

शब्दार्थ: गरदन उचकाए = गरदन ऊँची करके (उत्सुकतावश); बाँकी चितवन = तिरछी नज़र; ठिठकी = रुकी/हैरान हुई।

प्रसंग: कवि बता रहे हैं कि बादलों के आने पर प्रकृति के अन्य अंगों (पेड़, आँधी, धूल और नदी) में कैसी प्रतिक्रिया होती है।

भावार्थ: हवा के तेज़ झोंकों से पेड़ कभी झुक जाते हैं और कभी सीधे हो जाते हैं; ऐसा लगता है मानो गाँव के लोग (पेड़) अपनी गरदन उचका-उचका कर मेहमान को देखने की कोशिश कर रहे हों। अचानक तेज़ आँधी चलने लगती है और धूल उड़ने लगती है; इसे देखकर ऐसा प्रतीत होता है मानो कोई गाँव की किशोरी घबराकर अपना घाघरा उठाकर दौड़ रही हो। हवा के कारण नदी के पानी में लहरें उठने लगती हैं; इसे देखकर कवि कल्पना करते हैं कि मानो गाँव की कोई बहू मेघ रूपी दामाद को देखकर थोड़ी ठिठक गई हो, और घूँघट सरका कर तिरछी नज़रों (बाँकी चितवन) से उसे निहार रही हो। इस प्रकार मेघ बड़े सज-धज कर आए हैं।

पद्यांश 3: पीपल, लता और तालाब की खुशी

बूढ़े पीपल ने आगे बढ़कर जुहार की,
'बरस बाद सुधि लीन्हीं'—
बोली अकुलाई लता ओट हो किवार की,
हरसाया ताल लाया पानी परात भर के।
मेघ आए बड़े बन-ठन के, सँवर के।

शब्दार्थ: जुहार की = आदरपूर्वक नमस्कार किया; सुधि लीन्हीं = याद किया; अकुलाई = व्याकुल/प्यासी; ओट हो किवार की = दरवाज़े के पीछे छिपकर; हरसाया = खुश हुआ; ताल = तालाब।

प्रसंग: इस पद्यांश में गाँव के बुजुर्ग (पीपल), विरहिणी पत्नी (लता) और सेवक (तालाब) द्वारा मेघ का स्वागत किया गया है।

भावार्थ: पीपल का पेड़ गाँव में सबसे पुराना और बड़ा होता है, इसलिए हवा चलने पर जब पीपल झुका, तो ऐसा लगा मानो गाँव के सबसे बुजुर्ग व्यक्ति ने आगे बढ़कर दामाद (मेघ) का झुककर आदरपूर्वक स्वागत (जुहार) किया हो। गर्मी से व्याकुल (अकुलाई) प्यासी लता रूपी नायिका ने दरवाज़े की ओट (पीछे) छिपकर उलाहना देते हुए मेघ से कहा कि "तुमने तो पूरे एक साल (बरस) बाद हमारी सुध ली है (याद किया है)।" मेहमान के आने की खुशी में तालाब पानी से छलकने लगा; मानो परिवार का कोई सदस्य या सेवक दामाद के चरण धोने के लिए पानी से भरी परात ले आया हो। आज बादल रूपी पाहुन पूरे सज-धज कर आए हैं।

पद्यांश 4: मेघ और बिजली का मिलन (वर्षा)

क्षितिज अटारी गहराई दामिनि दमकी,
'क्षमा करो गाँठ खुल गई अब भरम की',
बाँध टूटा झर-झर मिलन के अश्रु ढरके।
मेघ आए बड़े बन-ठन के, सँवर के।

शब्दार्थ: क्षितिज = जहाँ धरती और आकाश मिलते हुए प्रतीत होते हैं; अटारी = छत/महल; दामिनि = बिजली; भरम = भ्रम/संदेह; अश्रु ढरके = आँसू बह निकले।

प्रसंग: अंत में बादलों और बिजली के मिलन तथा मूसलाधार बारिश होने का मनमोहक वर्णन किया गया है।

भावार्थ: क्षितिज (आकाश) रूपी ऊँची छत (अटारी) पर काले बादल पूरी तरह छा गए हैं और उनमें बिजली (दामिनि) चमकने लगी है। बिजली की चमक को देखकर ऐसा लगता है मानो लता रूपी पत्नी का यह भ्रम दूर हो गया हो कि उसका प्रियतम (मेघ) नहीं आएगा। वह कहती है कि "मुझे क्षमा कर दो, मेरे मन में जो संदेह था कि तुम नहीं आओगे, वह अब दूर हो गया है।" अंततः उन दोनों का मिलन हो जाता है और उनके प्रेम तथा खुशी का बाँध टूट पड़ता है, जो झमाझम बारिश के रूप में धरती पर गिरने लगता है। मानों मिलन की खुशी में दोनों की आँखों से खुशी के आँसू बह निकले हों। इस प्रकार, बादल पूरे गाँव में खुशी लाते हुए सज-धज कर आए हैं।

megh aaye waiting

परीक्षा उपयोगी महत्वपूर्ण प्रश्न (PYQs)

प्रश्न 1 कवि ने बादलों (मेघों) की तुलना किससे की है और क्यों?
उत्तर: कवि ने बादलों की तुलना शहर से गाँव आए हुए 'पाहुन' (दामाद) से की है। जिस प्रकार दामाद के गाँव आने पर वह सज-धज कर आता है और उसके स्वागत में पूरे गाँव में हलचल और खुशी छा जाती है, लोग उसे देखने के लिए उत्सुक हो जाते हैं, ठीक उसी प्रकार भयंकर गर्मी के बाद जब काले बादल सज-धज कर आसमान में आते हैं, तो पूरी प्रकृति उनका उत्साहपूर्वक स्वागत करती है।
प्रश्न 2 'लता' ने मेघ रूपी मेहमान को उलाहना क्यों दिया?
उत्तर: 'लता' ने किवाड़ की ओट से मेघ को उलाहना देते हुए कहा कि "तुमने तो पूरे एक साल बाद हमारी याद की है।" ऐसा इसलिए है क्योंकि लता गर्मी से झुलस रही थी और प्यासी थी। वह वर्षा का बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी, जो पूरे एक साल के बाद आई है। यहाँ लता का मानवीकरण एक ऐसी विरहिणी पत्नी के रूप में किया गया है जो अपने प्रियतम (मेघ) से लंबे समय बाद मिल रही है।
प्रश्न 3 कविता में प्रकृति के किन-किन अंगों का मानवीकरण किया गया है?
उत्तर: इस कविता में कवि ने बहुत ही सजीव मानवीकरण किया है: